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लौरचंदा पेंटिंग्स – मध्यकालीन भारतीय इस्लामी चित्रकला

 

 

दिल्ली सल्तनत के काल में शाही महलों और शाही अन्तःपुरों और मस्जिदों से भित्तिचित्रों के वर्णन प्राप्त हुए हैं। इनमें मुख्यतया फूलों, पत्तों और पौधों का चित्रण हुआ है। इल्तुतमिश (1210-36) के समय में भी हमें चित्रों के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। अलाउद्दीन खिलजी(1296-1316) के समय में भी हमें भित्ति चित्र तथा वस्त्रों पर चित्रकारी और अलह्कत पाण्डुलिपियों पर लघुचित्र प्राप्त होते हैं। सल्तनत काल में हम भारतीय चित्रकला पर पश्चिमी और अरबी प्रभाव भी देखते हैं। मुस्लिम शिष्टवर्ग के लिए ईरान और अरब देशों से फ़ारसी और अरबी की अलंकृत पाण्डुलिपियों के भी आने के सन्दर्भ प्राप्त होते हैं। इस काल में हमें अन्य क्षेत्रीय राज्यों से भी चित्रों के सन्दर्भ मिलते हैं। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के महल को अलंकृत करने वाली चित्रकारी ने बाबर और अकबरदोनों को ही प्रभावित किया। 14वीं 15वीं शताब्दियों में सूक्ष्म चित्रकारी गुजरात और राजस्थान में एक शक्तिशाली आन्दोलन के रूप में उभरी और केन्द्रीय, उत्तरी और पूर्वी भारत में अमीर और व्यापारियों के संरक्षण के कारण फैलती चली गई। मध्यप्रदेश में मांडु, पूर्वी उत्तरप्रदेश में जौनपुर और पूर्वी भारत में बंगाल – ये अन्य बड़े केंद्र थे जहाँ पाण्डुलिपियों को चित्रकला से सजाया जाता था।

9-10वीं शती में बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा आदि पूर्वी भारतीय प्रदेशों में पाल शासन के अंतर्गत एक नई प्रकार की चित्रण शैली का प्रादुर्भाव हुआ जिसे ‘लघुचित्रण'(miniature) कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ये लघुचित्र नाशवान पदार्थों पर बनाए जाते थे। इसी श्रेणी के अंतर्गत इनसे बौद्ध, जैन और हिन्दु ग्रंथों की पाण्डुलिपियों को भोजपत्रों पर सजाया जाने लगा। ये चित्र अजंताशैली से मिलते जुलते थे परंतु सूक्ष्म स्तर पर। ये पाण्डुलिपियाँ व्यापारियों के अनुग्रह पर तैयार की जाती थीं जिन्हें वे मंदिरों और मठों को दान कर देते थे।

तेरहवीं शताब्दी के पश्चात उत्तरी भारत के तुर्की सुलतान अपने साथ पारसी दरबारी संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्वरूपों को भी अपने साथ लाए। पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दियों में पश्चिम प्रभाव की अलंकृत पाण्डुलिपियाँ मालवा, बंगाल, दिल्ली, जौनपुर, गुजरात और दक्षिण में बनाई जाने लगीं।
चौर पंचाशिका चित्र शैली सामान्यत 15 वी 16 वी सदी की चित्रित पांडुलिपियों मे दिखाई देती है. चौर पंचाशिका शैली मुख्य रूप से दिल्ली जौनपुर क्षेत्र मे पाई गयी है जिसका विस्तार राजस्थान, मालवा और पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों मे हुआ था.

चौर पंचाशिका कश्मीर के कवि बिल्हण का ग्रंथ है जो 11 वीं सदी के अंत में और 12 वीं सदी के प्रारंभ में लिखा गया था. यह ग्रंथ एक चौर की प्रेम कहानियों का विवरण है. इसकी विषय वस्तु राजपूत चित्रकला में कलाकारों की पसंदीदा रही हैं. यह जैन लघु चित्रकला पर फारसी प्रभाव का उदाहरण है.

इसी तरह मौलाना दाऊद का अवधि में लिखा ग्रंथ 1525 इस्वी की फारसी हिंदी चित्रकला के उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह शैली भी चौर पंचाशिका से प्रभावित है. और भारतीय इस्लामिक चित्रकला का उदाहरण है.

तूतीनामा के लेखक ज़ियाल-दीन नक्शाबी या सिर्फ नक्शाबी थे। वे एक फ़ारसी चिकित्सक और एक सूफी संत थे तथा 14 वीं शताब्दी में भारत में बदायूं, उत्तर प्रदेश चले गए थे, इन्होने फ़ारसी भाषा में अपना लेखन किया था।

चौदहवीं शताब्दी की फारसी भाषा में लिखित 52 कहानियों का संग्रह तूतीनामा, 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मुग़ल शासक अकबर द्वारा 250 लघु चित्रों के रूप में दोबारा बनवाया गया था तथा यह एक प्रमुख संकलन है। और तो और इसका लेखन हमारे निकटवर्ती बदायूं में ही किया गया था।

यह एक प्राचीन परन्तु बहुत मनोरंजक कथा संग्रह है, अकबर के शासन काल में 250 लघु चित्रों के संकलन को इसमें सम्मलित किया गया। जिसकी एक प्रति आज भी रामपुर के रज़ा पुस्‍तकालय में संग्रहित है। वास्‍तव में तूतीनामा की अधिकांश कहानियां संस्‍कृत कथासंग्रह ‘शुकसप्तति’ से प्रेरित हैं।

तूतीनामा का शाब्‍दिक अर्थ है ‘तोते की कथा’। तूतिनामा की 52 कहानियों का मुख्य कथावाचक एक विद्वान तोता है जो अपने मालिक जिसका नाम ‘मिमुनिस’ था, की आज्ञानुसार ‘खोजस्ता’ नाम की उसकी पत्नी को अवैध सम्बन्ध बनाने से रोकने के लिए हर रात उसे एक कहानी सुनाता और उसे बाहर जाने से रोक लेता। यह प्रक्रिया पूरे 52 दिनों तक चलती रही, हर रात कथा का आरम्भ होता और अगला दिन शुरू होते ही कथा का अंत। खोजस्ता का पति एक व्यापारी था जो काम के सिलसिले में घर से बाहर गया हुआ था। इसलिए उसने अपनी पत्नी को तोता और मैना की एक जोड़ी उपहार में दी । घर छोड़ कर ना जाने की सलाह देने पर क्रूर खोजस्ता ने मैना का गला दबा दिया। परिस्थिति की गंभीरता को ध्यान में रख कर तोते ने यह उपाय खोजा कि वह 52 रात्रियों तक खोजस्ता को मनोरंजक कहानी सुनाएगा ताकि खोजस्ता का ध्यान कहानी पर लगा रहे और वह घर से ना भाग सके।

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